नक्कारखाने में तूती बोलती है !

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खरी-खरी...✍️
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सुनियोजित सिंडिकेट के मकड़जाल में दम तोड़ता सच


कमलेश कुमार सोनी

पूर्व प्रधान संपादक 
दैनिक शान ए मालवा समाचार-पत्र

इंदौर



अपरिहार्यता के बीच आशावादी होना निश्चित ही सकारात्मक विचारधारा का पोषक है! मगर वर्तमान भारत में राजनैतिक उत्कंठा या अति महत्वकांक्षी शक्तियो ने झूठ के आडंबर से सच के आईने पर पर्दा डालने के लिए बकायदा सुनियोजित सिंडिकेट तैयार कर लिया है!

 ताजा घटनाक्रमों से इस परिदृश्य को समझा जा सकता है! हाल ही में एक वरिष्ठ पत्रकार पर देश के अलग-अलग राज्यों में देशद्रोह जैसे संगीन मामले में प्रकरण दर्ज किए गए है और इन प्रकरणो में गिरफ्तारी से बचने के लिए पत्रकार को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेना पड़ी! मतलब साफ है, सच को कहने के लिए भी आपको किसी पर निर्भर होना पडेगा! ये कितना दुर्भाग्यपूर्ण है, कि जिस देश का संविधान व्यक्ति को बोलने, विचार प्रकट करने की आजादी देता है! उसी संविधान की रक्षा करने की शपथ लेने वाली शक्तियाँ राजनैतिक प्रोपेगेंडा खड़ा कर षडयंत्रपूर्वक अपने खिलाफ उठ रही आवाज और विचारों को दबाने का कुत्सित खेल-खेल रही हैं।



 तथापि इस पूरे घृणित खेल का सबसे दुखद पहलू यह भी है, कि भारतीय संविधान का चौथा स्तंभ, समाज को सच का आईना दिखाने वाला मिडिया भी स्वहित के चलते लालच और चापलूसी की भेंट चढ गया ! इस भ्रम जाल के मोहपाश से "क्या आम,क्या खास" कोई अछूता नही है! आम जनता अज्ञानता से विवश अपने ही दुख से दुखी है, तो कथित बुद्धिजीवी, चिंतक, विचारक षडयंत्र के मोहपाश से बचने के लिए चुप्पी साधे मूकदर्शक बने बैठे है!
 दही की हांडी से "लस्सी" का स्वाद चखने की पिपासा को शांत करने की सभी में होड मची है! 
गाहे-बगाहे सत्ताधारी शक्तियों के छल और रसूख के खिलाफ कोई आवाज मुखर होने का प्रयास करती भी है, तो सुनियोजित सिंडिकेट के मकड जाल में फंसाकर प्रोपेगंडा खड़ा कर दिया जाता है, फिर शुरू होता है, विद्रोह को दबाने-कुचलने का घृणित खेल...

यकीन मानिए,,,, झूठ के पूलिंदे को सच दिखाने का खेल, इतना शातिराना होता है कि सच-झूठ के बीच का फर्क  सत्ता और रसूख की कठपुतली बना नजर आता है! जहाँ झूठ, सच के सिर चढकर अपना वर्चस्व दिखाता है, वही सच के तो अस्तित्व को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है! 
मगर इतना तो तय है, झूठ, आडंबर, फरेब, भ्रष्टाचार कितना ही प्रोपेगंडा रचे, झूठ को सच दिखाने के छलावे का  कितना भी षडयंत्र रच लें! सच को सच कहने का साहस रखने वाले सचेतक स्वाभिमान को सर्वोपरि रख जीवटता से अपने जीवित होने का प्रमाण देते आए है! फिर चाहे परिणाम कुछ भी हो! 

विशेष-

(इस आलेख में प्रदर्शित विचार मेरे अपने हैं, समसामयिक घटनाक्रमो का विश्लेषण भर है, इनका किसी राजनैतिक दल, संगठन आदि से कोई लेना-देना नही है- लेखक)

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