संस्कृति-राष्ट्र-ज्ञान पर गहन विमर्श ने श्रोताओं को आत्मचिंतन के लिए झकझोरा
भारती दीक्षित की काव्यात्मक 'दास्तान-ए-शंकर' ने किया भावविभोर
'तत्त्वमसि' विमर्श में स्वयंसेवक भावना का उद्घोष- प्रगति गुप्ता व टीना शर्मा के विमर्श ने श्रोताओं को बाँधे रखा
Media Kesari
Jaipur
भरतपुर। ब्रज मंथन और महारानी श्री जया महाविद्यालय के तत्वावधान में ब्रज संवादोत्सव के तीसरे संस्करण का धमाकेदार आयोजन महारानी श्री जया महाविद्यालय के सेंट्रल हॉल में हुआ। विचार, कला, साहित्य, इतिहास और राष्ट्रबोध का अनोखा मेलजोल देखने को मिला, जिसने सैकड़ों श्रोताओं को गहरे आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम सरस्वती वंदना और दीप प्रज्वलन से शुरू हुआ। रोहित और मनप्रीत ने भावपूर्ण वंदना प्रस्तुत की। उद्घाटन सत्र में डॉ. ओमप्रकाश भार्गव की 'कुटुम्बकम' और डॉ. लहरी राम मीणा द्वारा संपादित 'हिन्दू संस्कृति और सत्तावादी राजनीति' का लोकार्पण मनोज द्वारा किया गया।
हिंदू संस्कृति: सत्य अन्वेषण की अनंत यात्रा
डॉ. लहरी राम मीणा ने कहा- "हिंदू संस्कृति किसी एक मत तक सीमित नहीं, बल्कि सत्य के सतत अन्वेषण की जीवंत प्रक्रिया है।" उन्होंने कहा कि हर साधन को पवित्र मानने वाली यह परंपरा ही इसकी सहिष्णुता का आधार है।
वहीं 'कुटुम्बकम' पर चर्चा में वक्ताओं ने इसे पारिवारिक विसंगतियों को जोड़ने वाली लघुकथाओं-संस्मरणों का यथार्थवादी संग्रह बताया।
'कुटुम्बकम' लघुकथाओं एवं संस्मरणों का संकलन है। जिसमें लेखक का संघर्ष आयातित नहीं है, मौलिक है, स्वयं भोग हुआ है, यथार्थ है। उनकी कहानियाँ परिवार की विसंगति को चित्रित करते हुए भी परिवार को जोड़नेकाम करती हैं।
'तत्त्वमसि': स्वयंसेवक जीवन का सशक्त चित्रण
पहले सत्र में श्रीधर पराड़कर के उपन्यास 'तत्त्वमसि' पर प्रगति गुप्ता और टीना शर्मा ने विमर्श किया। पारितोष बाबू के जरिए स्वयंसेवकों के समर्पण को सजीव किया गया।
पुस्तक की केंद्रीय भावना को रेखांकित करते हुए उद्धृत किया गया-
"कोई भी शब्द ऐसा नहीं जिसका उपयोग मंत्र में न होता हो, कोई भी वस्तु ऐसी नहीं जिसका उपयोग औषधि में न होता हो, कोई भी व्यक्ति अयोग्य नहीं सब कुछ उपयोगकर्ता पर निर्भर करता है।"
वक्ताओं ने कहा, सेवा ही स्वयंसेवक को राष्ट्र रणभूमि में उतारती है।
पुराण: भारतीय संस्कृति के मूल स्रोत
दूसरे सत्र में प्रो. शिवकुमार मिश्र ने पुराणों को संस्कृति का मूल आधार बताया।उन्होंने कहा कि पुराण केवल प्राचीन कथाओं का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन, संस्कृति और ज्ञान परंपरा के स्रोत हैं।
पुराणों में उज्जैन महाकाल, अयोध्या नगरी, सरस्वती नदी, सोलह संस्कार, नक्षत्र काल गणना और सृष्टि की उत्पत्ति तक का विस्तृत वर्णन मिलता है। उन्होंने बताया कि आज के आधुनिक विषय जैसे बनस्पति विज्ञान, इतिहास, राजनीति और संस्कृति के बीज भी पुराणों में विद्यमान है।
आदि शंकराचार्य की काव्यात्मक दास्तान ने बांधे श्रोता
तीसरे सत्र में भारती दीक्षित ने काव्य-किस्सा शैली में आदि शंकराचार्य की गाथा सुनाई, जो श्रोताओं को भावविभोर कर गई।
डिजिटल युग में पठन संस्कृति का नया दौर
चतुर्थ सत्र में नीति वर्मा ने ई-पुस्तकालय एवं डिजिटल पठन' विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा विकसित डिजिटल पठन एप और वेबसाइट की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह आज के किशोर एवं युवा विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी शैक्षणिक संसाधन है।
काकोरी कांड की डॉक्यूमेंट्री ने जगाया स्वतंत्रता का जज्बा
ब्रज संवादोत्सव के आखिरी सत्र में काकोरी कांड पर लघु फिल्म दिखाई गई, जिसने स्वाधीनता संग्राम के बलिदानों को जीवंत कर दिया।
इन अतिथियों की रही गरिमामयी उपस्थिति
इस अवसर पर महारानी श्री जया महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सुनीता पाण्डेय,सामाजिक कार्यकर्ता भागीरथ सिंह, ब्रज मंथन के कार्यकर्ता जैनेंद्र अग्रवाल, मीनू गेरा, डॉ. सौम्य परमार,डॉ. जितेन्द्र रैकवार, पीयूष फौजदार, विवेक कुमार गुप्ता सहित शिक्षाविद्-साहित्यकार व गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद एवं महारानी श्री जया महाविद्यालय से नरेंद्र निर्मल, डॉ. योगेंद्र भानु सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमियों की सहभागिता रही।
मंच संचालन डॉ. दिलीप कुमार गर्ग और श्रुति गुप्ता ने किया।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्र-संस्कृति समर्पण के स्वर में हुआ।




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