कोरोना के बहाने लोकतंत्र को कुचलने की गहरी साजिश !

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मोदी के लिए राजनीति देशहित से ज्यादा महत्वपूर्ण है




विजय शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार ✍🏻 
जयपुर



कोरोना वायरस कोविड-19 जैसा भी हो, लेकिन इससे कई नेताओं को छप्परफाड़ राजनीतिक लाभ हुआ है. भारत सहित विभिन्न लोकतांत्रिक देशों के प्रमुखों को कोरोना के बहाने अपने देश की जनता को बुरी तरह भयभीत करने और दबाकर रखने का मौका मिल गया है. बीमारी अपनी जगह है और फैल रही है, लेकिन जनता को इससे बचाने के लिए सरकार ने जो नियम थोपे हैं, उसके पीछे नीयत अलग है.  बीमारी चीन से शुरू हुई. यूरोप में बड़ी संख्या में लोग मरे. अमेरिका हिल गया. कोरोना के आतंक की लहर पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी सवार हो गए और उन्होंने लोकतंत्र के साथ ही नागरिकों के मानवाधिकारों को भी  मजाक बनाकर रख दिया. 



कोरोना का पूरे विश्व में इतना प्रचार हो चुका है कि उसके अलावा और कोई बीमारी इतनी ख़तरनाक नहीं. टीबी, कैंसर भी नहीं.  सिर्फ कोविड-19 ही है, जिससे जनता को बचाना सरकार जरूरी मानती है. भारत सहित तमाम विकासशील देशों का यही हाल है. लॉकडाउन, मास्क की अनिवार्यता और सोशल डिस्टेंसिंग के नियम भारत सहित कई देशों में जनता पर थोप दिए गए हैं. इसके पीछे विश्व को अपने हिसाब से चलाने वाली ताकतों की साजिश मालूम पड़ती है, जिससे कि विकासशील देशों के नेता उनकी कठपुतली की तरह काम कर सकें और जनता किसी भी तरह का आंदोलन न करे. इटली, स्पेन, जर्मनी सहित कई पश्चिमी देशों में कोरोना का कहर दिखा तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने फरवरी में इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया और विश्व बैंक ने कोरोना से बचने के लिए विभिन्न देशों को सहायता देने के उद्देश्य से 160 अरब डॉलर का बजट तय कर दिया.

कोरोना से बचने के लिए आसान दरों पर कर्ज लेने वाले देशों पर तीन अव्यवहारिक शर्तें थोपी गई. लॉकडाउन, मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग. विश्व बैंक से धनराशि लेने के लालच में विभिन्न देशों के नेताओं ने ये शर्तें मान ली, जिनमें भारत भी शामिल है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी आगा-पीछा सोचे बगैर एक बिलियन डॉलर के लालच में दो महीने की लोगबंदी कर दी और मीडिया को काम पर लगा दिया कि वह कोरोना के अलावा और किसी खबर को महत्व न दें. मोदी को राजनीति करनी थी. उनके लिए राजनीति देशहित से ज्यादा महत्वपूर्ण है. यही कारण था कि उनहोंने अन्य देशों की तरह सीधे दो महीने लॉकडाउन  नहीं किया, बल्कि किस्तों में किया. पहले 21 दिन, फिर 19 दिन, फिर 15 दिन, उसके बाद 31 मई तक.

विश्व बैंक की शर्तों के कारण भारत की अर्थ व्यवस्था के साथ ही सामाजिक व्यवस्था का भी तिया-पांचा हो चुका है. करोड़ो लोगों के पैर उनकी कर्मभूमि से उखड़  चुके हैं. तमाम कारोबारी गतिविधियां ठप हो चुकी हैं. मोदी कहते हैं कि संकट का समय है, जनता सरकार के साथ सहयोग करे. जनता तो हमेशा ही सरकार के साथ रहती है. लेकिन सरकार चलाने वाले बेईमान हो जाएं तो जनता क्या करे? मास्क लगाने वाला ढंग से बोल नहीं सकता. सोशल डिस्टेंसिंग हो तो सम्मेलन नहीं हो सकता और लोगबंदी हो तो कोई घर से बाहर नहीं निकल सकता. जनता की आवाज को दबाने का इससे बेहतर उपाय और क्या हो सकता है?

दुर्भाग्य की बात है कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी भी सिर्फ एक बिलियन डॉलर के लिए अपने देश की जनता पर लोकतंत्र का दम घोटने वाली शर्तें थोपने को तैयार हो गए. यह अभी तक साबित नहीं हुआ है और कभी होगा भी नहीं कि कोरोना संक्रमण से बचने के लिए ये तीन शर्तें  कहां तक कारगर है, लेकिन यह अवश्य साबित हो चुका है जनता की आवाज दबाने, सरकार के विरोध को शांत रखने और लोकतंत्र का गला घोटने के लिए इससे बेहतर शर्तें हो ही नहीं सकती. भारत में लोगों से इन शर्तो का पालन जबरन करवाने के लिए पुलिस का उपयोग किया जा रहा है. मास्क नहीं लगाने वाले पिट रहे हैं. जो लोग घर से बाहर निकल रहे हैं, वे भी पिट रहे हैं. बड़ी संख्या में लोगों का शहरों से गांवों की तरफ जो पलायन हो रहा है, वह भी मोदी की अदूरदर्शिता की सबसे बड़ी मिसाल है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मोदी एक कुशल अभिनेता, भाषणकर्ता और मजमेबाज नेता हैं,  जिनकी उपयोगिता चुनाव प्रचार में हो सकती है, लेकिन देश की सरकार चलाना उनके बस की बात नहीं. भाजपा को प्रधानमंत्री बदलने पर अवश्य विचार करना चाहिए, नहीं तो वह जनता की नजरों से हमेशा के लिए उतर जाएगी.

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