घोर अंधकार में क्या कोई आशा की किरण है ?

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मंथन


स्वप्नेश सोनी

पत्रकार✍🏻
उज्जैन

पुरातन काल से आज तक भारत ने न जाने क्या-क्या आपदाओं, विपदाओं को सहा है ,बेहद मुश्किल भरे कठिन समय को भी देश ने मिलजुलकर हराया है और बेहद अच्छे समय को भी पूर्ण शालीनता से अंगीकार किया है।
इसी देश मे पिछले कुछ समय से ऐसी परिवर्तन की धारा प्रवाहित हुई है कि विश्वास नही होता कि ये वही प्राचीनतम संस्कृति से ओतप्रोत आस्था, विश्वास, दया,करुणा,प्रेम  को ह्रदय स्थल में बसाने वाला ,वसुधैव कटुम्बकम का पावनतम सन्देश देने वाला देश इतना परिवर्तित कैसे हो सकता है??
सत्य और असत्य की निर्णय क्षमता का हास होना, ग़लत को ग़लत कहने की शक्ति खत्म होना, दिमागी रूप से दिवालियापन दिखाते हुए सुनियोजित रूप से फैलाये गये भ्रम को अंतिम सत्य स्वीकार कर अन्य को भी इसे सत्य मानने हेतु बाध्य कर देना.. क्या ये भारतीय परम्परा है??



लोकतंत्र द्वारा दी गई अभिव्यक्ति की आजादी का खुल्लमखुल्ला अतिक्रमण सभ्यता की श्रेणी में शामिल कैसे हो गया??
सबसे बड़ी बात कि विकटतम समय मे बुद्धिजीवियों,लेखकों,चिंतको,विचारकों,साहित्यकारों का मौन क्या प्रदर्शित कर रहा है??लोकतंत्र का स्वयंघोषित चौथा स्तम्भ क्या ईमानदारी से अपनी भूमिका निर्वहन कर रहा है??
न जाने कितने प्रश्न हैं और  कोई सत्य पथ प्रदर्शक नही है ।विचित्र अंधकार है ,विलक्षण समय है।जन गण ने भारत की संस्कृति को हमेशा उन्नत रखा है और इस विकट काल मे भी जन-गण  ही अंतिम आशा किरण है जो लगातार मन्द हो रही है।

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