भारत-चीन सीमा विवाद -- 1962 से अब तक......गहन-गंभीर विश्लेषण से युक्त आलेख

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चीनी घुसपैठ क्या हमारी खुफिया एजेंसियों की नाकामी नहीं है ?





विजय शंकर सिंह की कलम से ✍🏻




लद्दाख की पयोग्योंग झील और गलवां घाटी में घुसपैठ मई महीने के अंत तक होने लगी थी और जून के पहले सप्ताह तक सीमा पर अंदर तक चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए की गतिविधियां बढ़ने लगी थीं। जब इस घुसपैठ की पहली सूचना देश को मिली तो सबसे पहला ध्यान जनता का ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका पर गया। खुफिया एजेंसियों की यह पहली बड़ी विफलता नहीं है, बल्कि करगिल में यह विफलता देश के सामने पहले भी आ चुकी है।

उस समय उक्त विफलता को दृष्टिगत रखते हुए करगिल रिव्यू कमेटी का गठन  29 जुलाई 1999 को रिटायर्ड आईएएस  अधिकारी के सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में किया गया था और उसके सदस्यों में, लेफ्टिनेंट जनरल केके हजारी, नेशनल सिक्युरिटी काउंसिल बोर्ड के सदस्य बीजी वर्गीज, और सदस्य सचिव नेशनल सिक्युरिटी काउंसिल बोर्ड के सचिव सतीश चंद्र थे। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 15 दिसंबर 1999 को लगभग सौ से अधिक, सैन्य और सिविल सेवा के अधिकारियों, भूतपूर्व प्रधानमंत्री और अन्य सांसदों से की गयी बातचीत पर तैयार कर के सरकार को सौंपी थी और सरकार ने 23 फरवरी 2000 को यह रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी और इस पर बहस हुयी। लेकिन रिपोर्ट के कुछ अंश गोपनीय थे जो आज भी गोपनीय हैं।



मीडिया में छपी कुछ खबरों के अनुसार, भारत चीन सीमा पर चीनी सेना पीएलए की घुसपैठ सम्बन्धी गतिविधियों में वृद्धि अगस्त 2019 में ही शुरू हो गयी। डेक्कन क्रॉनिकल में छपे प्रतिष्ठित पत्रकार,  सैकत दत्ता के अनुसार, इसका एक काऱण जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल 2019 को सरकार द्वारा संसद से पारित कराना भी था। बीच बीच मे यह भी खबरे आती रहीं कि चीन की चिढ़ और उसकी घुसपैठ का कारण अनुच्छेद 370 में कतिपय संशोधन करना था। हालांकि यह बिल और अनुच्छेद 370 में संशोधन का प्रकरण देश का अंदरूनी मामला है और इससे न तो चीन का कोई संबंध है और न ही पाकिस्तान का। लेकिन जम्मू कश्मीर और लद्दाख के कुछ क्षेत्रों जो क्षेत्रफल की दृष्टि से विशाल हैं, उन पर, पाकिस्तान और चीन दोनो का अवैध कब्जा है तो उन्होंने इस पर अपनी अनावश्यक आपत्ति भी जताई थी।

बहरहाल, चीनी घुसपैठ का जो भी कारण हो, चाहे वह चीन की विस्तारवादी नीति का परिणाम हो, या कोई अन्य तात्कालिक कारण, पर यह एक प्रकार से खुफिया एजेंसियों की बड़ी विफलता का परिणाम तो है ही। इसके कई कारण है जिंसमे एक कारण इन एजेंसियों में समय समय पर सुधार, आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान न देना और कुछ हद तक, सरकार का इन एजेंसियों के प्रति उदासीन रवैया भी है। करगिल रिव्यू कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में खुफिया एजेंसियों की विफलता के कई उदाहरण पाए और उन्हें दुरुस्त किये जाने के लिये कई सुझाव भी सरकार को दिये। लेकिन उन सुझावों पर हुआ क्या यह अभी तक पता नहीं चला है। इन सुझावों के अनुसार एक मंत्रिमंडलीय समिति ग्रुप ऑफ मिनिस्टर औऱ कई टास्क फोर्स गठित किये जाने थे तो खुफिया एजेंसियों के दायित्व, क्रियाकलाप और अन्य विषयों पर विस्तार से अध्ययन कर के अपनी रिपोर्ट और संस्तुतियों को देते।



आज़ादी के बाद विकास के अन्य क्षेत्रों में  परिवर्तन तो हुआ, नए नए प्रतिष्ठान खड़े किए गए, नहरें और बांध बने पर भारत ने वाह्य सुरक्षा की ओर ध्यान कम दिया और 1962 ई में यही लापरवाही देश के चीन के हाथों पराजय का एक प्रमुख कारण भी बनी। 1962 में कम संसाधनों के बावजूद भारतीय सैनिकों ने, सीमा पर जिस अदम्य और अचंभित कर देने वाले शौर्य का प्रदर्शन किया था वह एक अजूबा था । चीन को विजय तो मिली थी, पर उसे यह भी आभास हो गया था कि भारतीय सैनिक युद्ध क्षेत्र मे उससे किसी भी दशा में कमतर नहीं हैं। यह अलग बात थी कि हम धोखे से युद्ध मे झोंक दिए गए थे और हमारे पास पर्याप्त संसाधन भी नहीं थे।

1962 की शर्मनाक पराजय, जिंसमे भारत की अच्छी खासी ज़मीन पर चीन ने कब्जा कर लिया था, के बाद, देश के इंटेलिजेंस व्यवस्था को सुधारने और उसे पुनर्गठित करने की एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू किया गया। 1962 की हार भारत को बाहरी खतरे के प्रति और उससे निपटने के लिये चैतन्य कर गयी थी। इसी के बाद, 1962 और 1968 ई के बीच तत्कालीन इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख रामनाथ काव की पहल पर बाह्य खुफिया एजेंसी के रूप में रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के नाम से एक नयी खुफिया एजेंसी रॉ का गठन किया गया। उत्तर प्रदेश कैडर के आईपी ( इम्पीरियल पुलिस - यह आईपीएस का पूर्व रूप था ) अधिकारी, राम नाथ काव इसके पहले प्रमुख बने। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 10 मई 1918 को जन्मे आरएन काव ने 1940 में जनपद कानपुर में सहायक पुलिस अधीक्षक एएसपी के रूप में अपनी पुलिस सेवा शुरू की थी ।



यूपी कैडर के राम नाथ काव और मध्य प्रदेश कैडर के, केएफ रुस्तम जी देश के उन चुने हुए पुलिस अफसरों में से हैं जिन्होंने क्रमशः रॉ और सीमा सुरक्षा बल को खड़ा किया और आज यह दोनो ही संगठन देश के वाह्य सुरक्षा और खुफिया तँत्र की रीढ़ बने हुए हैं। राम नाथ काव, भीड़ और प्रचार से दूर रह कर काम करने वाले एक दूरदर्शी अधिकारी थे और रॉ के गठन के पहले वाह्य खतरों और वे खतरे कहाँ कहाँ से आ सकते हैं इसका अध्ययन भी उन्होंने किया फिर उन्होंने 1962 की पराजय के कारणों की एक विस्तृत समीक्षा की और तब वे उन समीक्षाओं के निष्कर्ष के आधार पर रॉ की कार्ययोजना तैयार की गयी। इंटेलिजेंस के क्षेत्र में आरएन काव दुनियाभर में एक जाना माना नाम है और उन्हें अपने क्षेत्र में जबरदस्त प्रोफ़ेशनल दक्षता हासिल थी।

कहते हैं, राम नाथ काव एक रहस्यमय व्यक्तित्व की तरह थे। उनके बारे में अनेक दंत कथाओं में एक यह भी है कि,  धूप के चश्मे के साथ उनकी कुछ ही फ़ोटो उपलब्ध हैं। वे लोगों से बहुत कम मिलते जुलते थे और मितभाषी भी थे। उन्होंने जिस प्रकार से रॉ को संगठित किया, उसके अच्छे परिणाम भी जल्दी ही मिलने शुरू हो गए। सबसे पहली सफलता रॉ को 1971 में बांग्लादेश युद्ध मे मिली। 1969 70 के समय जैसे ही पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर्रहमान के दल अवामी लीग ने अपना आंदोलन शुरू किया और जब यह लगने लगा कि पाकिस्तान के दोनों ही अंग एक दूसरे से अलग हो सकते हैं और पाकिस्तान के इस गृहयुद्ध के कारण, इसका दुष्परिणाम भारत को भोगना पड़ सकता है, तो रॉ सक्रिय हो गई और मुक्ति वाहिनी के गठन के बाद तो इसकी भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो गयी। युद्ध मे सेना की भूमिका तो सबसे महत्वपूर्ण होती ही है, पर युद्ध के दौरान सटीक खुफिया सूचनाओं के अभाव में कोई भी युद्ध गौरवपूर्ण ढंग से नहीं जीता जा सकता है। 1971 के बांग्लादेश युद्ध मे रॉ की भूमिका पर्दे के पीछे थी और सराहनीय भी थी।

1971 के बांग्लादेश युद्ध मे रॉ की सफल भूमिका के बाद सिक्किम के भारत मे शामिल किए जाने में जो ग्राउंडवर्क किया गया था और जो पृष्ठभूमि बनी थी उसका बहुत कुछ आधार रॉ ने ही बनाया था। राम नाथ काव का सबसे बड़ा योगदान यह था कि, उन्होंने अक्सर उपेक्षित समझे जाने वाले खुफिया तँत्र को सरकार के एक प्रमुख और महत्वपूर्ण अंग के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था। खुफिया तंत्र में उन्होंने समय समय पर सुधार की अनेक योजनाओं का सूत्रपात किया और आधुनिकीकरण के कार्यक्रमो को जारी रखा। लेकिन 1977 के बाद जब मोरार जी देसाई की सरकार बनी तो रॉ को जबरदस्त झटका लगा और उसके वाह्य संगठन स्ट्रक्चर का बहुत ही नुकसान हुआ।

इंटेलिजेंस ब्यूरो ब्रिटिश राज द्वारा गठित एक खुफिया एजेंसी है जिसका ब्रिटिश काल मे मुख्य उद्देश्य था, देश के लोगों, महत्वपूर्ण व्यक्तियों और ब्रिटिश राज विरोधी गतिविधियों पर नज़र रखना। तब राज का विरोध और आज़ादी के आंदोलन का विरोध ही ब्रिटिश कालीन खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो का एक प्रमुख कर्तव्य था। लेकिन इंटेलिजेंस ब्यूरो उसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए राजनीतिक इंटेलिजेंस तक ही अधिक सीमित रही और यह लम्बे समय तक सरकार के राजनीतिक हितों को ही फोकस में रखते हुए अपना काम करती रही। आईबी का प्रमुख देश का सबसे वरिष्ठ पुलिस अफसर होता है और इस नाते वह प्रधानमंत्री के सबसे अधिक निकट भी होता है। आईबी प्रमुख की सरकार से निजी निकटता के कारण कभी कभी कुछ राजनैतिक दिक्कतें भी हुयी है, और आईबी के एक प्रोफ़ेशनल खुफिया एजेंसी होने पर विपक्ष द्वारा सवाल भी खड़े किए गए हैं और आईबी पर सत्तारूढ़ दल के प्रति पक्षपात का भी आरोप लगा है।  प्रधानमंत्री के आंख और कान जैसी निकटता की परंपरा आईबी के दूसरे निदेशक रहे बीएन मलिक और जवाहरलाल नेहरू के बीच की निकटता से शुरू हुयी।

कभी कभी यह निकटता इतनी निजी स्तर पर हो जाती है कि खुफिया तंत्र व्यक्ति या सत्तारूढ़ पार्टी के हित मे अपनी सेवाएं देने लगता है और सीज़र से भी अधिक राजभक्त होने की होड़ में ज़मीनी सूचनाएं और उन सूचनाओं की व्याख्या भी, 'जैसा रोगी चाहे वैसा वैद्य बतावे' की तर्ज़ पर देने लगता है। ख़ुफ़िया तंत्र का इस प्रकार राजनीतिकरण और सत्ता के साथ जुड़ जाना न केवल तंत्र को विफल कर देता है बल्कि उसे उसके असल उद्देश्य से भटका भी देता है। कहते हैं इमरजेंसी के समय आईबी ने इंदिरा गांधी को यही बताया था कि कोई विरोध नहीं होगा और 1977 के चुनाव में वे पुनः वापस लौटेंगी। पर हुआ इसका उलटा। वे खुद भी चुनाव हार गयीं और यूपी बिहार में उनकी पार्टी कांग्रेस को एक भी सीट नही मिली। एक काबिल खुफिया तंत्र को चाहिए कि वह सरकार को वह सब भी बताये जो असल मे ज़मीनी सच होता है पर सरकार उसे सुनना नहीं चाहती है। चाटुकारिता भरी लंतरानी टाइप अभिसूचनाये अन्ततः सरकार और देश दोनों को हानि पहुंचाती हैं।

खुफिया तंत्र में करगिल रिव्यू कमेटी सहित और उसके अतिरिक्त, कई सुधार प्रस्तावित हुए और उन्हें लागू करने की कई कोशिशें भी समय समय पर हुयीं पर वे बहुत अधिक सफल नहीं हो सके। 1998 - 99 में सचिवालय में, नेशनल सिक्यूरिटी काउंसिल के गठन की बात हो या, 1999 - 2000 में करगिल रिव्यू कमेटी या 26 / 11 के मुंबई हमले के  बाद गठित नरेश चंद्र टास्क फोर्स पर मंत्रिमंडल समूह की बैठक का प्रयोग हो, इन सब कवायदों से खुफिया एजेंसियों की रुग्णता का इलाज नहीं हो सका। बहसे हुयीं और तरकीबें खूब सुझाई गयीं पर कोई भी मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ। खुफिया जिसे सरकारी रूप से अभिसूचना कहते हैं के दो अंग होते हैं। एक खुफिया एजेंसी को मिलने वाली सूचनाएं और दूसरे उनका विश्लेषण। संदेह किसी भी खुफिया सूचना का मूल मंत्र है। विश्वसनीय से विश्वसनीय सोर्स भी ऐसी सूचना दे सकता है जो तथ्यों के विपरीत हो औऱ कभी कभी वह भटका  भी ( मिसलीडिंग ) सकता है। इसलिए कच्ची अभिसूचनाओं का भी अन्य सोर्स से परीक्षण किया जाता है। फिर उनका विश्लेषण और फॉलो अप किया जाता है।

अब खुफिया तंत्र की चीनी घुसपैठ की भूमिका पर ज़रा बात करें। लद्दाख क्षेत्र में हुई घुसपैठ अप्रत्याशित नहीं है। अक्साई चिन के इलाके पर चीन का अवैध कब्जा है ही और पाक अधिकृत कश्मीर से हो कर उसकी दो महत्वपूर्ण परियोजनायें, एक चीन से ग्वादर बंदरगाह जो पाकिस्तान में है, तक जाने वाला हाइवे और दूसरी ओबीओआर की बेहद महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाये चल रही हैं। लद्दाख के पयोग्योंग झील और गलवां घाटी की उन आठ पहाड़ियों जिन्हें फिंगर्स कहते हैं के फिंगर्स 8 तक हमारी भी गश्त होती थी, जहाँ अब हमें चीन जाने भी नहीं दे रहा है और हमारी सीमा में भी घुस कर बैठ गया है। इससे साबित होता है कि चीन की गतिविधियां लगातार हमारी सीमा पर सक्रिय रही हैं। लद्दाख में भी और अरुणाचल में भी और यदा कदा सिक्किम सीमा पर भी।

क्या हमारी खुफिया एजेंसियों को जिंसमे रॉ, आईबी और मिलिट्री इंटेलिजेंस के भी लोग शामिल हैं को इन सबकी भनक समय रहते नहीं लग जानी चाहिए थी ? अगर खुफिया एजेंसियों ने सरकार को समय रहते बता दिया था और तब भी सरकार चुप्पी साधे रही तो यह सरकार की बड़ी विफलता है। पुलवामा में आरडीएक्स से भरी गाड़ी से विस्फोट कर के सीआरपीएफ के कनवाय की एक बस उड़ा दी जाती है और उसमें कुल 48 सीआरपीएफ के जवान घटनास्थल पर ही बेहद दुःखद परिस्थितियों में मारे जाते है, और इस षडयंत्र की भी भनक अगर खुफिया एजेंसी को नहीं मिलती है तो यह भी उसकी विफलता ही है। क्योंकि वह इलाक़ा लंबे समय से आतंकी गतिविधियों से संक्रमित रहा है और आज भी है । खुफिया एजेंसियों की इस विफलता को गम्भीरता से लेने की आवश्यकता है अन्यथा आगे भी ऐसी घटनाएं होने की संभावना बनी रहेगी। सैकत दत्ता के विश्लेषण के अनुसार, आज़ाद भारत की किसी भी सरकार ने देश के इंटेलिजेंस तन्त्र में व्याप्त खामियो को दूर करने और उसे समय के अनुरूप ढालने की कोई कोशिश नहीं की। शासन की सबसे प्रमुख और संवेदनशील तंत्र खुफिया एजेंसियां कभी भी किसी भी सरकार की प्राथमिकता में रही ही नहीं। इनका उपयोग या बेहतर हो यह कहें इनका दुरुपयोग केवल दलगत राजनीतिक दृष्टिकोण से ही समय समय पर किया जाता रहा है।

इसका परिणाम यह हुआ कि, खुफिया एजेंसियों द्वारा जुटाई गयीं सूचनाओं का विश्लेषण भी सही ढंग से नहीं किया गया और जिसके फलस्वरूप, 1962 के चीनी आक्रमण से लेकर आज गलवां घाटी की घुसपैठ की घटना तक देश को, बाहरी और चीनी खतरा भोगना पड़ रहा है। विरोधी दलों के नेताओ की गतिविधियों, जजो और महत्वपूर्ण अधिकारियों की गतिविधियों पर  नज़र रख कर सरकार के पक्ष में ज़रूरत पड़ने पर उन्हें झुकाने या ब्लैकमेल करने के अनेक किस्से गॉसिप की तरह मीडिया, सत्ता के गलियारों, और अफसरों की सर्किल में गूंजते रहते हैं। इन सब से सरकार या सत्तारूढ़ दल पर किसी खास नेता की पकड़ भले ही मजबूत हो जाय पर इससे खुफिया एजेंसियों की प्राथमिकता जो देश हित मे अभिसूचना संकलन और विश्लेषण की है वह पीछे छूट जाती है। और साथ ही खुफिया अफसर, सरकार के कुछ चुनिंदा लोग और पार्टी के चंद प्रमुख नेताओं का एक गठजोड़ उभर कर सामने आ जाता है जिंसमे देश और देश की सुरक्षा का मूल उद्देश्य ही जाने अनजाने ही सही, पीछे रह जाता है। करगिल रिव्यू कमेटी ने इसी प्रकार के अपवित्र गठजोड़ जिसे अंग्रेजी में नेक्सस कहते हैं, का उल्लेख अपनी रपट में किया है।

अक्सर कहा जाता है कि इंदिरा गांधी के पास कुछ नेताओं की, जो उनके प्रतिद्वंद्वी हो सकते थे, और कुछ प्रमुख विरोधी दलों के नेताओ की फाइलें, जिंसमे उनके बारे में कुछ ऐसी सूचनाएं जिनसे समय पड़ने पर उन्हें झुकाया जा सके,  रहती थी जिससे कोई भी पक्ष या विपक्ष का नेता इंदिरा गांधी का मुखर विरोध नहीं कर पाता था। यही बात आज भी कही जा रही है, पर यह सब एक कयास है और प्रमाण के अभाव में इस पर कुछ कहा भी नहीं जाना चाहिए। यह एक ध्रुव सत्य है कि, सत्ता से कोई भी दल हटना नहीं चाहता है और सत्ता में बने रहने के लिये वह हर संभव प्रयास भी करता है। खुफिया एजेंसियों और पुलिस का दुरूपयोग इसी ग्रँथि का एक परिणाम है।  सरकार राजनीतिक जासूसी के लिये अलग विभाग का गठन चाहे तो कर सकती है, पर देश के लिये वाह्य और आंतरिक शत्रुतापूर्ण गतिविधियों की खुफिया जानकारी समय से मिलती रहे और भविष्य मे फिर कोई खुफिया विफलता न हो जाय इसके लिये एक संगठित और सुगठित तंत्र का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।

आज गलवां घाटी में जो कुछ भी हुआ है वह एक प्रकार से खुफिया विफलता ही है। आज कल खुफिया एजेंसियों के पास सूचना एकत्र करने और फिर उसके विश्लेषण के लिये अधुनातन संसाधन उपलब्ध हैं। आईबी, रॉ, मिलिट्री इंटेलिजेंस, के पास ऐसे उपकरण हो सकता है हों भी, फिर भी सितंबर से यह घुसपैठ जारी है, जैसा कि कुछ अखबारों में छपा है और मई के अंत तक तो अच्छी खासी संख्या में चीनी पीएलए के सैनिक घुसपैठ कर के, लद्दाख के भारतीय इलाके में बैठ भी चुके थे। 3 जून को रक्षामंत्री का बयान फिर उसके बाद विदेश मंत्री का वक्तव्य, 6 जून को जनरल स्तर की फ्लैग मीटिंग और 15 जून की 20 सैनिकों की शहादत इस बात का प्रमाण है कि यह अचानक हुयी घुसपैठ नही थी, बल्कि यह लम्बे समय से धीरे धीरे हो रही एक सुनियोजित घुसपैठ थी और इसकी लेशमात्र भी कोई भनक तक, हमारी खुफिया एजेंसियों को नहीं लग पायी। ऐसी सामरिक और इंटेलिजेंस विफलताओं का आकलन, दुनिया भर के मित्र और शत्रु देशों की खुफिया एजेंसियां करती है और इसी से उन्हें हमारी क्षमता और योग्यता का पता भी चलता है।

हालांकि 19 जून को सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया 'न तो कोई घुसा था और न ही कोई घुसा है', वाला बयान तथ्यों के विपरीत है और वह क्यों दिया गया यह बात तो पीएमओ ही बता सकता है। उक्त बयान को चीन, गलवां घाटी के संदर्भ में, भारत की अधिकृत लाइन के रूप में प्रयोग कर रहा है। यह कहा जा सकता है कि चीन ऐसा गलत और झूठ कह रहा है और पीएम के बयान को तोडमोड कर प्रस्तुत कर रहा है, पर झूठ, वितंडा, और प्रोपेगैंडा तो राजनय के मान्य सिद्धांत हैं ही।  रायटर, और पीटीआई ने गलवां घाटी घुसपैठ के जो सैटेलाइट इमेज जारी किये हैं उनसे यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि, चीनी सैनिक अभी भी हमारे इलाके में हैं और हल्की फुल्की संख्या में नही  बल्कि एक मजबूत नफरी उनकी है और वे वहां स्थायी स्ट्रक्चर भी बना चुके हैं और युद्ध के साज़ ओ सामान का जमावड़ा भी कर रहे हैं। ख़ुफ़िया एजेंसियां इन सब गतिविधियों की सूचना, सैटेलाइट इमेजिंग से भी जिससे धरती पर हो रहे परिवर्तन की पल पल की खबर रखी और विश्लेषित की जा सकती है, एकत्र कर सरकार और सेना से साझा करने में विफल रही हैं। डेटा और इमेजिंग विश्लेषण विज्ञान अब एक वैज्ञानिक विधा की तरह विकसित हो गया है, जिसका ख़ुफ़िया एजेंसियों को प्रयोग करना चाहिए। पर सवाल उठता है कि क्या यह सब हमारी प्राथमिकता में है भी ?

लद्दाख क्षेत्र में चीनी पीएलए का खतरा कोई नया और आकस्मिक खतरा नहीं है। यह 1962 से चल रहा है और एक अच्छी खासी जंग भी यहां दोनो देशों में हो चुकी है। उसके बाद भी अगर खुफिया तंत्र घुसपैठ का अभिज्ञान, एकत्रीकरण और विश्लेषण करने में असफल रहता है तो यह एक शर्मनाक प्रोफ़ेशनल इंटेलिजेंस विफलता के अतिरिक्त और कुछ नही है। करगिल रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट के कुछ अंश बेहद अचंभित करते हैं। उस कमेटी की रिपोर्ट को प्राप्त हुए, आज बीस साल बीत चुके हैं, पर किसी भी सरकार ने उसके निष्कर्षों, और सुझाओ पर ध्यान नहीं दिया है। इसका परिणाम कहीं गलवां घाटी, तो कहीं पयोग्योंग झील, तो कहीं डोकलां तो कहीं अरुणांचल के तवांग में में चीनी घुसपैठ के रूप में मिल रहा है।

1999 में गठित कमेटी की रिपोर्ट का यह अंश मैं सैकत दत्ता के ब्लॉग से उद्धृत कर रहा हूँ, पठनीय है। रिपोर्ट कहती है,
" ऐसा लगता है कि राजनीतिक, नौकरशाही, सैनिक और खुफिया तंत्र ने मिल कर एक ऐसा गठजोड़ बना लिया है जो यथास्थितिवाद से निकलना ही नही चाहता है। जब शांतिकाल रहता है तब राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन का मुद्दा हमारी प्राथमिकता की पृष्ठभूमि में चला जाता है और जब युद्ध या क्षद्म युद्ध का काल आता है तो यह मुद्दा इतना संवेदनशील हो जाता है कि इस पर कोई भी कड़ी बात कहने से बचता है। "
आगे कमेटी की रिपोर्ट कहती है,
" हमारे पास सभी एजेंसियों को मिलाजुला कर बना हुआ कोई भी ऐसा एकीकृत संस्थागत ढांचा नहीं है जिससे सूचनाओं के आदान प्रदान, संकलन और विश्लेषण की प्रक्रिया उन सूचनाओं के उपभोक्ताओं जैसे सेना, पुलिस, सुरक्षा बलों तक समय समय पर पहुंचा दी जाय। साथ ही ऐसा भी कोई मैकेनिज़्म नहीं है जिससे इन खुफिया एजेंसियों की कार्यक्षमता, उनके अभिलेखों का परीक्षण और उनकी गुणवत्ता की पड़ताल तथा छानबीन की जा सके। "

ख़ुफ़िया एजेंसियों की विफलता को सरकार द्वारा गम्भीरता से लेना होगा और प्राथमिकता के आधार पर करगिल रिव्यू कमेटी तथा कोई कमेटी बना कर विफलता के कारणों की पहचान कर के उचित निदान करना होगा अन्यथा गलवां घाटी जैसी घटनाएं आगे भी हो सकती हैं। भारतीय राज शास्त्र के अग्रणी ग्रन्थ अर्थशास्त्र में  और मनीषी चाणक्य ने राज्य को संगठित और सुगठित रखने के लिये जगह जगह पर अभिसूचना तंत्र जिसे गुप्तचर विभाग कहा जाता है का उल्लेख किया है। यह भारत की समृद्ध राजनय की परंपरा को ही बताता है। पर विडंबना है कि सरकार का यह महत्वपूर्ण अंग प्राथमिकता में उतनी प्रमुखता से नही है, जितना उसे होना चाहिए। सरकार को गलवां घाटी की खुफिया विफलता पर गम्भीरता से विचार करके जो भी जिम्मेदार हों उनके विरुद्ध कार्यवाही करनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी विफलता दुबारा न हो। चीन के सैनिक अभी वापस गए नहीं है। अगर वे जल्दी नहीं वापस भेजे जाते तो यह घुसपैठ धीरे धीरे और अंदर तक फैलेगी। यह एक संक्रमण की तरह है जिसका प्रभावी इलाज ज़रूरी है। खतरा बड़ा है और अभी बिल्कुल भी टला नहीं है।

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