प्रसंगवश -- किस-किस बात के लिए रोवोगे.. आंसू कम पड़ जाएंगे...!!

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2014 से हमारा देश भी कुछ ऐसे ही हाथों मे पड़ा हुआ है !




साभार-- जितेंद्र नरुका ✍🏻



बुढ़िया ने 'हाथ-आटा चक्की' खुटवाने वाले कारीगर को बुलाया और बोली, "देख भाई जानता तो है ना? ये रही चक्की, इसे ठीक कर दे बस, आज लायक दलिया बचा था वो चूल्हे पर चढ़ा दिया है, तू इसे ठीक कर, तब तक मै कुए से मटकी भर लाती हूँ।"

कारीगर बोला, "ठीक है अम्मा, तू चिंता मत कर, मेरी कारीगरी के सात गाँवों में चर्चे हैं, चक्की ऐसी खोटूंगा कि आटा पीसेगी तो मैदा निकलगी और चूल्हे पर चढ़ा तेरा दलिया भी सम्भाल लूंगा।"



बुढ़िया आश्वस्त होकर कुए को निकल गयी और कारीगर चक्की की खुटाई करने लगा। काम करते हुए हत्थे से निकलकर अचानक हथौड़ी उछलकर चूल्हे के ऊपर लटकी हुई घी की बिलोनो पर पड़ी... घी सहित बिलोनी चूल्हे पर चढ़ी दलिये की हांडी पर जा गिरी।



कारीगर हड़बड़ा गया और हड़बड़ाहट मे चक्की का पाट भी टूट गया। कुछ समझ मे आता, उससे पहले चूल्हे पर बिखर गए घी से लपटें भभकीं तो फूस की छत ने आग पकड़ ली और झोंपड़ी धूं धूं जलने लगी।
कारीगर घबराकर उलटे पाँव भागा तो रास्ते मे आती बुढ़िया से टकरा गया और उसकी मटकी गिर कर फूट गयी।

बुढ़िया चिल्लाई, "अरे करमजले, तुझे ऐसी भी क्या जल्दी थी.. अब रात को क्या प्यासी सोऊंगी? एक ही मटकी थी वो भी तूने फोड़ दी।"

कारीगर बोला, "अरे अम्मा तू किस-किस को रोयेगी..
पानी की मटकी को रोयेगी या घी की बिलोनी को रोयेगी या दलिये की हांड़ी को रोयेगी या कि टूटी चक्की को रोयेगी या जल गई अपनी झोंपड़ी को रोयेगी?"
ये कहता हुआ कारीगर झोला उठा कर भाग निकला।
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देश भी 2014 से कुछ ऐसे ही देश को बर्बाद करने वालों के हाथों मे पड़ा हुआ है,
GDP को रोवोगे या कोरोना को रोवोगे या बेरोजागरी को रोवोगे या महंगाई को रोवोगे या बर्बाद बिक चुकी संस्थाओं संसाधनों को रोवोगे.. किस-किस को रोवोगे.. आंसू कम पड़ जाएंगे... !

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