सामाजिक सरोकारों व मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत कविताओं द्वारा रजनी माथुर कर रही हैं प्रेरित

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समाजसेवा व गायन में भी रुचि रखती हैं रजनी माथुर



मीडिया केसरी नेटवर्क



जयपुर-21 अक्टूबर।  स्त्री चाहें पौराणिक काल की रही हो या फिर आधुनिक युग की, समाज मे व्याप्त रूढ़ियों, नारी उत्पीड़न जैसे विषयों पर लेख या कविता लिखना हमेशा ही चुनौतीपूर्ण रहा है। 

 जयपुर की युवा कवयित्री रजनी माथुर ने इस चुनौती को स्वीकारा और बचपन से ही कविताएँ लिखती आ रही हैं। इनकी कविताएँ विभिन्न समाचार-पत्र व पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। इनकी कविताओं में स्त्री के मन की पीड़ा व मानवीय संवेदनाएँ झलकती हैं।


 रजनी माथुर ने बताया कि उन्हें कविता लिखने के साथ-साथ गायन व समाजसेवा में भी काफ़ी रुचि है और इस कार्य मे उनके पति दिनेश माथुर उनका भरपूर सहयोग करते आए हैं। 

 साकार महिला विकास समिति, प्राइड ऑफ टैलेंट जैसी सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहकर रजनी ने कोरोना-काल मे ज़रूरतमंदों की सहायता भी की।


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  प्रस्तुत है रजनी माथुर द्वारा लिखी एक कविता--




हे नारी तुम तो नारायणी हो !


     रजनी दिनेश माथुर ✍🏻


आज आंसू बहा रही है ये धरा और कह रही है



हे नारी तुम तो नारायणी हो, तुम दुर्गा हो, तुम शक्ति हो,

फिर क्यूं तेरे हाथ कांप रहे, उठा लो तलवार हाथ में,

निर्णय तुम ही को करना है।


कर दो टुकड़े उन राक्षशों के, जो तुम पर अपने गंदे हाथ बढ़ाए,

बहा दो नदियां खून की जो नारी को दरिंदगी का शिकार बनाएl


मन कांप उठा है हम सभी का, जब सुना उस बाला का दर्द

कितनी तड़फी होगी वो बाला, लेकिन क्या जाने ये कानून के ज्ञाता, क्या जाने ये सत्ता पोश।


अब तुम जागो हे नारी,  अबला नहीं सबला हो तुम,

शक्ति भी हो, दुर्गा भी हो और महाकाली हो तुम, 

उठा लो तलवार हाथ में, निर्णय तुम को ही करना है, 

बहा दो नदियां खून की,

उन राक्षसों का अंत जो करना है, उन राक्षसों का अंत जो करना है......


ताकि मस्तक उठा न सके कोई 

अपने गंदे इरादों से,

अपने गंदे इरादों से....


      

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