हाथरस नहीं मनाली की हसीन वादियों से जुमले भेज रहा है नीरो

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नीरो और फ़ासिस्ट हीरो की जुगलबंदी देश के लोकतंत्र पर पड़ रही भारी



यूसुफ किरमानी ✍🏻


नई दिल्ली



रोम के जलने पर नीरो अब बाँसुरी नहीं बजाता वह मनाली की हसीन वादियो को किसी टनल के उद्घाटन के बहाने निहारने जाता है।


वही नीरो मोर को दाना चुगाते हुए अपने चेहरे पर मानवीयता की नक़ाब ओढ़ लेता है।

वह हाथरस कांड पर चुप है। नाले के गैस पर चाय बनाने से लेकर टिम्बर की खेती की सलाह देने वाला शख़्स सोलंग (हिमाचल प्रदेश) में लोकनृत्य पर अहलादित हो रहा है।




नीरो के लिए हाथरस एक सामान्य घटना है। उसे यक़ीन है कि उसका फ़ासिस्ट हीरो हाथरस संभाल लेगा।


फ़ासिस्ट हीरो ने हाथरस में वो कर दिखाया जो नागपुर प्रशिक्षण केन्द्र से प्रशिक्षित होकर निकले किसी सेवक ने आजतक नहीं किया था।


फ़ासिस्ट हीरो ने जब तक चाहा मीडिया के परिन्दों को पर नहीं मारने दिया।


मीडिया को हाथरस के उस गाँव में घुसने और गैंगरेप व हत्या की शिकार लड़की के परिवार से मिलने की इजाज़त तब मिलती है जब सारे सबूत मिटा दिए जाते हैं। उसकी लाश परिवार की ग़ैरमौजूदगी में जलाई जा चुकी है। उल्टा पीड़ित परिवार के नारको टेस्ट की इजाज़त दी जा चुकी है। कई फ़र्ज़ी दस्तावेज़ वायरल किए जा चुके हैं। पालतू अफ़सर से पिता को धमकाया जा चुका है।


फासिस्ट हीरो विपक्षी दलों को प्रदर्शन की इजाज़त तक नहीं देता है। वह अपने पालतू अफ़सरों से नेता विपक्ष को धक्का दिलवाता है।


फासिस्ट हीरो अपने  पालतू अफ़सरों के ज़रिए राज्यसभा के सम्मानित और बुज़ुर्ग सांसद से दुर्व्यवहार करता है।


फासिस्ट हीरो गांधी जयंती पर नापाक हरकतें करते हुए चरख़ा भी काटता है।  


नीरो और फ़ासिस्ट हीरो की यह जुगलबंदी देश के लोकतंत्र पर भारी पड़ रही है। संविधान और संवैधानिक संस्थाओं को ताक पर रख दिया गया है, कुछ के साथ तो हाथरस जैसा सामूहिक बलात्कार कर दिया गया है। गुजरात की प्रयोगशाला का विस्तार उत्तर प्रदेश तक कर दिया गया है। बिहार को नई प्रयोगशाला बनाने की तैयारी है। 


इंसाफघर को गिरवी रख दिया गया है। इंसाफघर का मालिक हर्लेडेविडसन पर चलता है। पिछला मालिक अयोध्या में इंसाफ़ की अस्मिता बेचने के एवज़ में अपर हाउस में एडजस्ट किया जा चुका है। एक और मालिक जल्द ही एडजस्ट किया जाएगा।


चप्पे चप्पे पर गुजरात काडर के उपकृत अफ़सरों की निगरानी है। शयनकक्ष के ख़ुलासी और चपरासी तक गुजरात से आयातित हैं। 


बाक़ी देश के लिए गाय, म्लेच्छ मुसलमान, नशीला बॉलिवुड और चीख़ते चिल्लाते चैनल और उनकी ब्लैकमेलिंग पत्रकारिता है। नोटबंदी, कोरोना, डूब चुकी अर्थव्यवस्था में भी बहुसंख्यक सनातनियों के मंसूबे परवान चढ़ रहे हैं। शैतान उनके सिरों पर सवार है। 


इंतज़ार कीजिए मनाली की हसीन वादियों से नीरो के मन की बात के कुछ जुमले उड़कर आते ही होंगे। 


(लेखक दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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