Abhilash Awasthi Book Reviews- PIPAL PAR GHOSLE NAHIN HOTE (पीपल पर घोंसले नहीं होते)-- कोरोनाकाल की यह 'प्रेम गाथा' सदियों तक पढ़ी जाएगी ! कोरोना पर दुनिया का पहला प्रेम ! On Amazon

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सुर्खियाँ बटोर रहा है कोरोना पर दुनिया का यह पहला उपन्यास

मुगले आज़म, शोले, थ्री इडियट्स..के बाद एक सम्पूर्ण फिल्मी कथानक है यह उपन्यास- कुणाल मिश्र

"धर्मयुग" पत्रिका में लगभग एक दशक तक वरिष्ठ उपसंपादक रहे अभिलाष अवस्थी बने 'मीडिया केसरी' के "प्रमुख सलाहकार"

Amazon पर उपन्यास की हो रही है रिकॉर्ड तोड़ बिक्री

प्रस्तुत है उपन्यास पर देश के विभिन्न हिस्सों से मिली समीक्षाएँ


हिमा अग्रवाल✍🏻

जयपुर/मुम्बई- 7 मार्च। हाल ही वैश्विक महामारी कोरोना पर दुनिया का पहला उपन्यास "पीपल पर घोंसले नहीं होते" ज़ारी हुआ है जो लगातार सुर्खियाँ बटोर रहा है। एक पावरफुल लव स्टोरी पर केंद्रित इस उपन्यास पर दुनिया भर से समीक्षक लगातार अपनी समीक्षाएँ लिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं।

 प्रसिद्ध हो चले इस उपन्यास के लेखक अभिलाष अवस्थी देश के जाने-माने पत्रकार,कथाकार,कवि होने के साथ ही 'धर्मयुग ' पत्रिका के लगभग एक दशक तक पूर्व वरिष्ठ उपसंपादक रहे हैं। 


समीक्षाएँ प्रस्तुत करने से पहले आप सभी सुधि पाठकों को उपन्यास का संक्षिप्त परिचय कराना चाहूँगी--

उपन्यास के बारे में

बचपन के जिन दो प्रेमियों को अलग करने की तमाम साजिशें रची गयीं, कोरोना ने उन्हें अचानक ही एक ऐसी छत के नीचे ला दिया - जहां उन दो के अलावा तीसरा जा भी नहीं सकता था।

एक डाॅक्टर लड़की दवाओं के अतिरिक्त अतीत के प्रेम-प्रतीकों  द्वारा क्या अपने कोरोना संक्रमित प्रेमी को बचा पाती है? 

कोरोना को हमने समाज से बहुत कुछ छीनते देखा, क्या कोरोना ने किसी से कुछ ऐसा भी छीना जो हममें से किसी को नहीं दिखा।

   इसी उपन्यास का अंश 

हर स्त्री के चेहरे पर सिर्फ दो आंखें होती हैं, मगर उसकी आत्मा में सैकड़ों खिड़कियां होती हैं। जिनसे वह बाहर की दुनिया के सच और झूठ देखती रहती है। जिनसे वह देखती है अपने पिता, पति, पुत्र, और अपने समाज से जुड़े हर पुरुष को और हमेशा के लिए अपने प्रेमी को। साथ ही हर स्त्री की आत्मा के बहुत भीतर एक रोशनदान होता है जिससे वह आजन्म अपने प्रथम प्रेम को देखती रहती है... चाहे वह कहीं भी हो... मैंने भी उसी रोशनदान से मनु को देखा है।


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सदियों तक पढ़ी जायेगी यह प्रेम गाथा - प्रशांत जैन

प्रशांत जैन का मानना है कि धर्मवीर भारती के उपन्यास 'गुनाहों का देवता' के बाद पवित्र प्रेम का ऐसा आख्यान उन्होंने नहीं पढ़ा।

प्रशांत आगे लिखते हैं कि यह कथा है मनु और श्रद्धा के प्रेम की। यद्यपि चरित्रों के नामों से यह कथा प्रसाद की 'कामायनी' और कथा में वर्णित प्रेम की उत्कटता व अनन्यता की वजह से धर्मवीर भारती के उपन्यास 'गुनाहों का देवता' की  याद दिलाती है, तथापि इस कथा की पृष्ठभूमि एवं परिप्रेक्ष्य उक्त दोनों ही रचनाओं से सर्वथा अलग हैं। इन दो कालजयी कृतियों से इस कथा का साम्य मात्र यह है कि उनकी ही तरह यह भी एक प्रेम कथा है। एक ओर जहाँ लौकिक प्रेम की तीव्रता कथा के मूल में है, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक प्रेम की विश्रांति और दार्शनिक प्रेम की मुक्ति भी कथा का अभिन्न अंग हैं। दूसरे शब्दों में प्रेम के अनेक रंग इस कहानी में अपनी संपूर्ण गरिमा एवं गंभीरता  के साथ मौजूद  हैं।


श्रद्धा एक सामान्य मध्यवर्गीय परिवार की  लड़की  है। बचपन से ही उसका साथी है घर के सामने वाली फुटपाथ पर स्थित पीपल  का एक पेड़ जिससे वह हमेशा अपना सुख-दुख बाँटती है। उसका एक और साथी है मनु, जिसके साथ खेलते हुए वह बड़ी  होती है। बचपन का यह पारस्परिक स्नेह युवा होने पर कब उन्हें एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य बना देता है, उन्हें पता ही नहीं चलता। मनु और श्रद्धा का प्रेम-संबंध अरबपति उच्च जाति के कोठारी परिवार को रास नहीं आया| कोठारी परिवार ने मनु को श्रद्धा से दूर करने के लिए मनु को पढ़ाई के बहाने विदेश भेज दिया |इधर श्रद्धा भी मनु के प्रोत्साहित करने पर मेडिकल एंट्रेंस एक्जाम में पूरी दिल्ली में टाॅप करके M.B.B.S. में दाखिला ले लेती है। छ: वर्षों बाद जब मनु भारत लौटता है तब वह एअरपोर्ट से पहला फोन श्रद्धा को ही करता है...श्रद्धा तिपहिया आटो में बैठी हुई मनु का फोन रिसीव करती है और बताती है कि उसे अस्पताल से अति - आपातकालीन काल पर तुरत बुलाया गया है| और श्रद्धा यह कहकर फोन काट देती है कि अस्पताल आ गया है, और हमारे सभी सीनियर डॉक्टर गेट पर ही एकत्र हैं| दूसरी तरफ मनु को भी एअरपोर्ट पर रोक लिया जाता है, और उसके बंगले में होनेवाली उसकी वेलकम पार्टी रद्द हो जाती है।

यही वह काला क्षण था जब यह पता चलता है कि कोरोना महामारी अनेक देशों की तरह भारत में भी दस्तक दे चुकी है। 


विधि की विडंबना देखिए कि जिस मनु को श्रद्धा से दूर रखने के लिए मनु के परिवार ने लाखों साजिशें कीं..वही मनु कोरोना संक्रमित होकर उसी कोरोना वार्ड में भेज दिया गया जिसकी इंचार्ज डाॅक्टर श्रद्धा सरन ही होती है| 

 बाॅडी शील्ड और मेडिकल कवच में रखे गये मनु को श्रद्धा तीन दिन बाद पहचान पाती है, लेकिन तब तक मनु  

' श्रद्धा - श्रद्धा ' फुसफुसाते हुए कोमा में चला जाता है | यहाँ से कहानी एक नया मोड़ लेती है। श्रद्धा अपने मनु को मृत्यु के मुख से खींच लाने का दृढ़ संकल्प ले लेती है। फ़िर शुरू होता है सामान्य स्थूल उपचार के साथ ही मनोवैज्ञानिक स्तर पर अवचेतन में स्थित विविध प्रेम-प्रतीकों के माध्यम से सूक्ष्म उपचार का सिलसिला। मनु की अंगुली में श्रद्धा का ही दी हुई घोड़े की नाल की अंगूठी, एस. डी.बर्मन का गाया गीत- "सुन मोरे बंधू रे...", राधाकृष्ण की चंदन की मूर्ति,हरसिंगार के गजरे....आदि का  प्रयोग श्रद्धा मनु को होश में लाने के लिए करती है| घर के किचेन में न आने और पूजा के सिंहासन को न छूने  के लिए मनु की माँ हमेशा श्रद्धा को डांटती- दुत्कारती रहती....क्या इस डांट  की रेकाॅर्डिंग भी मनु को होश में लाने में कोई भूमिका निभाती है | .इस दौरान श्रद्धा किन चुनौतियों से गुज़रती है? उसका आत्मविश्वास और एकनिष्ठ समर्पण किस तरह से आशा की लौ जलाए रखता है?वह अंजलि पंडित कौन थी जो श्रद्धा को रोज- रोज पराजय से बाहर खींचकर उस मनु की जान बचाने को प्रेरित करती रहती, जिस मनु को चीफ मेडिकल आफिसर ने क्लिनिकली डेड घोषित कर दिया है? अंतत: श्रद्धा अपनी संकल्प-शक्ति से  मनु की प्राण रक्षा में सफल होती है या नहीं- यह आप पुस्तक पढ़कर स्वयं ही जानें तो बेहतर होगा।

 एक कहानी को पढ़ने के लिए जिज्ञासा का जो तत्व आवश्यक होता है, कहानी के विस्तार में जाकर पाठकों का रस भंग करना मैं उचित नहीं समझता।


बहरहाल शुरुआती कुछ पृष्ठों में ही कहानी का इंद्रजाल पाठक को अपने प्रभाव में ले लेता है और शीघ्र ही पाठक स्वयं भी कहानी का हिस्सा बन जाता है। लेखक अभिलाष अवस्थी की प्रेक्षण क्षमता अद्भुत है और स्थितियों का यथार्थ और जीवंत चित्रण उसकी विशेषता। सहज एवं तरल लेखनी की वजह से पात्रों के आवेगों-संवेगों में डूबता-उतराता पाठक पौने चार सौ पृष्ठों की यात्रा कब पूरी कर लेता है पता ही नहीं चलता। 


अंत में मैं कहना चाहूँगा कि धर्मवीर भारती के उपन्यास 'गुनाहों का देवता' के बाद पवित्र प्रेम का ऐसा अद्भुत आख्यान कम से कम मैंने तो नहीं पढ़ा।


कई किरदारों की मौजूदगी राही मासूम रजा के 'आधा गाँव' की याद दिलाती है

शीर्षक " पीपल पर घोंसले नहीं होते !"  पढ़कर ही उपन्यास के प्रति गहरा आकर्षण उत्पन्न हुआ और पूरी किताब पढ़ कर समझ आया शीर्षक का मर्म। यह कहना है मयंक पांडेय का ..


उपन्यास के बारे में मयंक प्रतिक्रियास्वरूप लिखते हैं कि तीन दोस्त्त विजय पंडित (संपादक), दामोदर कोठारी (व्यवसायी एवं समाज सेवी) और सरन (सैनिक) की 30 साल पुरानी दोस्ती और उनके सामाजिक वातावरण के इर्द गिर्द घूमती कहानी में नया मोड़ तब आता है जब दामोदर के बेटे मनु और सरन की बेटी श्रद्धा के बीच एक नैसर्गिक प्रेम का प्रारंभ होता है। 

प्रेम पर बहुत पढ़ा है लेकिन 'गुनाहों का देवता' और 'चरित्रहीन' जैसी रचनाएँ ही रहीं जिन्हें पढ़ते समय आंखे भीग गयी थीं। 'पीपल पर घोंसले नहीं होते! 'पढ़ते समय भी ठीक वैसा ही हुआ। लेखक अभिलाष अवस्थी ने  दूसरे ही पेज पर इसे अपने गुरु धर्मवीर भारती जी को समर्पित किया है|

श्रद्धा और मनु को दूर करने के लिए दामोदर अपने पुत्र को 6 साल के लिए अमेरिका भेज देता है और इधर मेधावी श्रद्धा मेडिकल की पढ़ाई पूरी करती है। प्रेम को न सीमाएं बांध सकी हैं और न ही कोई बंधन। मनु की वापसी कोरोना काल मे होती हो और वो एयरपोर्ट से घर न आकार सीधा अस्पताल पहुँच जाता है। 

आगे की कहानी ........... मनु कोरोना संक्रमित है और उसी अस्पताल में भर्ती होता है जहां श्रद्धा कोरोना वार्ड की इंचार्ज है। यहाँ से शुरू होती है प्रेम की वो गाथा जहां विज्ञान ने भी हाथ खड़े कर दिए। और प्रेम इतना उद्दात और पवित्र कि ....... पढ़ कर यही निकला मुंह से कि ऐसा लेखन धर्मवीर भारती का चेला ही कर सकता है। इस पूरी रचना में श्रद्धा और मनु को सृष्टि के प्रथम पुरुष और स्त्री के मध्य प्रेम के समतुल्य स्थापित किया है। प्रेम संगीत का आठवाँ सुर है और पांचवां वेद है जैसे दृष्टांत दिल की गहराइयों में उतरते हैं। कुछ पंक्तियाँ जो दिल को छू गई .....


[[प्रेम जब मौन हो जाता है तो चारों दिशाओं से उस पर प्रश्न खड़े कर दिए जाते हैं। मगर प्रेम जब मुखर होता है बड़े बड़े धर्मशास्त्र, विचारधाराएँ ....... धीरे धीरे समुद्र में माटी के ढेले की तरह घुल जाते हैं ! ]]


[अजीब सा विरोधाभास है। ऐसे ग्रन्थों की पूजा करेंगे जिनमें प्रेम का पक्ष लिया गया हो; उन देवताओं और मनीषियों की पूजा करेंगे जिन्होंने प्रेम का संदेश दिया है; मगर जब स्वयम के बच्चे प्रेम करने लगे तो उनका अस्तित्व हिल जाता है।]


आगे इतना ही कहूँगा कि प्रेम कथा के अद्भुत चित्रण के अलावा इसमें भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का अनूठा वर्णन है। लेखक ने कोरोना काल में समाज की सोच में आए बदलाव को कई किरदारों के माध्यम से एक ताने- बाने में पिरो कर बहुत ही खूबसूरत अंदाज में प्रस्तुत किया है। कई किरदारों की मौजूदगी राही मासूम रजा के आधा गाँव की याद दिलाती है। लेखक की खासियत  है वे  एक ही पात्र को कभी खलनायक तो कभी आदर्श बना देते हैं और पाठक को आभास ही नहीं होता। कोरोना काल की विभीषिका को सामाजिक ताने बने के साथ गूँथ कर एक प्रेम कथा में पिरोने का काम लेखक अभिलाष अवस्थी ने बहुत ही करीने से  किया है।

उपन्यास की अलंकृत भाषा कथ्य को 

व्यक्त करने में पूर्ण रूप से सफल है।

मूलरूप से कवि होने के कारण लेखक की लेखनशैली काव्यात्मक और  भावना पूर्ण है, जो पाठक के मर्म को कुरेदती रहती है।


अंत में यही कहा जा सकता है कि घरों की लाइब्रेरी में यह पुस्तक इसलिए संजोने लायक है ताकि आज के बच्चे बड़े होकर कोरोना के क्रूर काल के भावनात्मक तथ्यों को भी समझ सकें।

इस पुस्तक को लंबे समय के लिए संग्रहणीय बनाने के लिए  इसकी सजिल्द प्रतियां प्रसार में ज्यादा रखनी चाहिए. आमुख पृष्ठ आकर्षक है और प्रिंटिंग भी काबिलेतारीफ. प्रलेक प्रकाशन की प्रस्तुति भी सराहनीय है।

कुल मिलाकर यह उत्कृष्ट साहित्यिक कृति संग्रहणीय है।


सदी की हिट फिल्म दे सकता है यह उपन्यास- कुणाल मिश्र

   मुगले आजम, शोले, थ्री इडियट्स... के बाद एक संपूर्ण फिल्मी कथानक अभिलाष अवस्थी के उपन्यास " पीपल पर घोंसले नहीं होते! " में दिखाई पड़ता है।

अगर इस प्रेम उपन्यास का स्क्रीन प्ले अच्छी तरह से लिख दिया जाये... तो यह इस सदी की हिट फिल्म होगी।

कोरोना पर "टाइटेनिक" जैसी यादगार फिल्म की तरह एक प्लाॅट मिल गया इस उपन्यास में... 


  सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कुछ इस तरह सुर्खियों में है उपन्यास--


Fantastic.... 

Love story!! 

अभिलाष अवस्थी का उपन्यास 

" पीपल पर घोंसले नहीं होते! "

कोरोना काल के बाद अचानक ही एमेजन की बुक लाइब्रेरी पर नजर पड़ी -- कोरोना पर दुनिया का पहला उपन्यास - " पीपल पर घोंसले नहीं होते! "

 उपन्यास मंगाया और फिर पढ़ने के दरमियान मैंने महसूस किया कि उपन्यास का हर पृष्ठ विजुअल होने जैसा है... ऐसी मर्मस्पर्शी कहानियों पर अगर फिल्म बने तो बेहतर होगा.. यह बात मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मैं भी फिल्म इंडस्ट्री से सीधा जुडा़ हूँ.. 

बधाई एमेजन!

 बधाई प्रलेक प्रकाशन!!

 बधाई लेखक अभिलाष अवस्थी

★★★★★★

वाह... वाह... 

पावरफुल लव स्टोरी!! 

 --  वीर सिंह


@ कोरोना जैसी दुर्दांत महामारी पर भी इतनी कोमल कथा की रचना की जा सकती है; यह बात मेरी कल्पना से परे थी! पेज दर पेज पूरा उपन्यास पढ़ने के बाद  स्तब्ध रह गया.... इस उपन्यास का अंत भी ऐसा है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है! 

@  पुरानी और नयी पीढ़ी दोनों के लिए समान रुप से ग्राह्य और पठनीय इस पुस्तक के खरीदे जाने का मैं समर्थन करता हूँ... प्रेम की यह पुस्तक अगर हर घर की लाइब्रेरी में हो तो निश्चित ही घर के हर सदस्य के संवेदनात्मक स्तर को ऊंचा उठाने में सहयोगी होगी ।


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लेखक का संक्षिप्त परिचय-


@ "धर्मयुग" (टाइम्स आफ इंडिया, मुंबई) पत्रिका में लगभग एक दशक तक वरिष्ठ उपसंपादक


@ कई दैनिक अखबारों और पत्रिकाओं के संपादक रहे


@ सूर्या समाचार चैनल के महाराष्ट्र हेड


@कहानीकार/ पटकथा लेखक/

@ सईद मिर्जा के धारावाहिक का लेखन

@ दुनिया की पहली संस्कृत फिल्म के हीरो सर्वदमन बनर्जी के लिए एक फिल्म की कथा- पटकथा- संवाद लेखन


@ कुछ चैनलों के लिए विभिन्न उत्सव विशेष पर कार्यक्रम लेख

@ एक फिल्म में गीत लिखे... 

कुछ कैसेट और एलबम में गजलें

@ लोकप्रिय उपन्यास ' एक शहर के विरुद्ध' और ' खैर जाने दीजिए' उपन्यास के लेखक


लेखन में 129 अवार्ड्स


एक छोटी सी गुज़ारिश--


देश के जाने-माने पत्रकार/कथाकार/कवि/ :

' धर्मयुग ' पत्रिका के पूर्व वरिष्ठ उपसंपादक

 अभिलाष अवस्थी

का उपन्यास पढ़ कर अपनी टिप्पणी अवश्य दें

@ एमेजन ( Amazon)  पर उपलब्ध

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