Kairana Crime News
सिर्फ कमजोरों को निशाना, रसूखदार भू-माफिया को खुली छूट?
✍️ गुलवेज़ आलम
स्वतंत्र पत्रकार, कैराना
(बेहिचक सवाल, बेखौफ़ कलम)
Media Kesari
कैराना। मुज़फ्फरनगर विकास प्राधिकरण (MDA) की कार्रवाई एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कैराना में अवैध कॉलोनियों के खिलाफ दिखावे की कार्रवाई के नाम पर आज सिर्फ चार कॉलोनी पर बुलडोज़र चलाया गया, जबकि बाकी दर्जनों कॉलोनियों को जानबूझकर नजरअंदाज़ कर दिया गया।
क्या यह विकास प्राधिकरण की निष्क्रियता है या फिर भू-माफियाओं से मिलीभगत का एक खुला प्रमाण?
मुख्यमंत्री का आदेश, मगर कार्रवाई दिखावटी?
बताया जा रहा है कि यह पूरी कार्रवाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के स्पष्ट निर्देश पर की गई, लेकिन स्थानीय अधिकारियों ने इसका उपयोग केवल एक ‘कागजी प्रदर्शन’ के रूप में किया। पानीपत रोड पर नायरा पेट्रोल पंप के निकट स्थित कॉलोनी को निशाना बनाकर MDA ने मानो “क्लीन अप” अभियान का चेहरा चमकाने की कोशिश की हो।
सूत्रों की मानें तो शहर में दर्जनों अवैध कॉलोनियाँ तेजी से फल-फूल रही हैं, जिनमें न केवल सड़कें, बिजली, पानी और सीवर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, बल्कि वहां भू-माफियाओं द्वारा लाखों की प्लॉटिंग खुलेआम की जा रही है — लेकिन उनपर कोई कार्रवाई नहीं!
सिर्फ कमजोरों को निशाना, रसूखदार भू-माफिया को खुली छूट?
जिन चार कॉलोनी पर कार्रवाई हुई, वहां कथित रूप से कोई मजबूत राजनैतिक या माफियाई पकड़ नहीं थी, इसलिए उसे बलि का बकरा बना दिया गया। जिन कॉलोनियों में भू-माफिया और स्थानीय नेताओं की मिलीभगत से प्लॉटिंग की जा रही है, वहां प्राधिकरण पूरी तरह मौन है। कोई नोटिस नहीं, कोई कार्यवाही नहीं, कोई जवाबदेही नहीं।
क्या यह माना जाए कि MDA चुनिंदा कार्रवाई करके ‘जनता की आंखों में धूल झोंकने’ का काम कर रहा है? क्या ऐसी एकतरफा कार्रवाइयाँ, वास्तव में भू-माफियाओं को संरक्षण देने की एक रणनीति बन गई हैं?
नकली बुलडोज़र कार्रवाई या राजनीतिक ‘सेफ पासिंग’?
जिस तरह से केवल चार कॉलोनी को ढहा कर बाकी सबको छोड़ दिया गया, वह सीधे तौर पर इस बात की ओर इशारा करता है कि या तो MDA भू-माफियाओं से डरता है, या फिर उन्हीं से मिला हुआ है। यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की कार्रवाई में भेदभाव देखा गया हो। प्राधिकरण का इतिहास इस बात का गवाह है कि कार्रवाई केवल वहीं होती है जहां विरोध की संभावना नगण्य हो।
प्राधिकरण खुद ही अवैध निर्माण का संरक्षक बना बैठा है?
सवाल यह भी है कि वर्षों से ये कॉलोनियाँ बन कैसे रही हैं? अगर कॉलोनी अवैध है तो उसका अस्तित्व कैसे संभव हुआ? प्राधिकरण और प्रशासन क्या कर रहे थे जब सड़कों की कटिंग हो रही थी, खंभे लग रहे थे, और रजिस्ट्री की जा रही थी?
या फिर ये सब कुछ ‘भू-माफिया – अफसर – दलाल’ त्रिकोण के सहारे ही हो रहा था? प्राधिकरण पहले आँखें मूँद कर सब कुछ बनने देता है, और फिर वक्त आने पर "निर्देशों के नाम पर" केवल उनपर कार्रवाई करता है जो कमजोर हैं या जिनका कोई राजनीतिक ‘गॉडफादर’ नहीं।
प्रशासनिक कार्यवाही या सांठगांठ का सार्वजनिक तमाशा?
आज की कार्रवाई, प्रशासनिक निष्पक्षता नहीं, बल्कि एक बेशर्म प्रदर्शन था उस सड़े-गले सिस्टम का, जिसमें सिर्फ कमजोर और बेसहारा कॉलोनियों पर ही बुलडोज़र चलता है, और असली ‘भूमाफिया फैक्ट्री’ पर हाथ डालने की किसी की हिम्मत नहीं होती।
कई कॉलोनियाँ ऐसी हैं जो पिछले पांच वर्षों में विकसित हुईं, जिनका न तो कोई नक्शा पास हुआ, न ही किसी विभागीय स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी हुई — फिर भी वहां सरकारी सुविधा और माफिया की प्लॉटिंग दोनों खूब चल रही हैं। क्या यह बिना प्रशासनिक संरक्षण के संभव है?
निष्कर्ष: प्राधिकरण की ‘चुनिंदा न्याय व्यवस्था’ को बेनकाब करता है बुलडोज़र शो
मुजफ्फरनगर विकास प्राधिकरण द्वारा केवल चार कॉलोनी पर बुलडोज़र चलाकर बाकी कॉलोनियों को छोड़ना पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। यह साफ दिखाता है कि कार्रवाई नीति के अनुसार नहीं, बल्कि राजनीति और दबाव के अनुसार तय होती है।
एमडीए यदि वास्तव में अवैध कॉलोनियों को लेकर गंभीर है, तो उसे सभी कॉलोनियों पर समान रूप से कार्रवाई करनी चाहिए, भू-माफियाओं के खिलाफ सार्वजनिक रूप से मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेजना चाहिए। नहीं तो यह सब केवल एक प्रशासनिक ड्रामा ही माना जाएगा — जनता को गुमराह करने और भ्रष्ट गठजोड़ को बचाने वाला ड्रामा।


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